काट रहे प्रारब्ध तमाम, बंध के रहना ना कोई प्रीत है
किनारे की एक आस है नदिया की भी प्यास है मंझधार की पुकार है रेत का भी संसार है ख़ाहिश हर किसी की है बंध के रहना न कोई रीत है जगत को जो चला रही विश्वास की एक प्रीत है कल कल करके बह रही संदेश नदिया दे रही अग्रसर अपने पथ पर निरंतर बह रही चाँद की चाँदनी बतला रही मार्ग रोशन हर किसी का कर रही पूजा-पाठ तीर्थ धाम मन को देते आराम नाम जप भगवान का नाम बना रहे सबके बिगड़े काम दान पुण्य और सेवा भाव काट रहे प्रारब्ध तमाम कन्या पूजन, महिला का सम्मान खोल रहा है सोते भाग कर्म किया जा अपना बन्दे हो जाएगा जीना असान