अनपढ़ समाज और अनपढ़ नेता चुप करा रहा शिक्षित जनता
ना जाने कब आँख वाले भी अंधे हो गए पैरों में बेड़ियाँ डाल कैदी हो गए समाज का ज्ञान हुआ तो निशब्द हो गए चार लोग क्या कहेंगे ये सोच के हैरान हो गए शिक्षा, ज्ञान, बात व्यवहार ये सब बेकार हो गये मूर्खों की संगत में रह कर ग्वार हो गए पढ़े लिखे को शीशा दिखा दे अनपढ़ भी समझदार हो गए लाल बत्ती भी उठा रही जूता ऐसा नेता सरकार हो गए झूठी खबर छप रही अखबार में विज्ञापन बढ़ रहे पाँव दबा रहे सरकारी नौकर अंगूठा छाप ज्ञान दे रहे अफवाहें उठ रही जंगल के आग सी देखो गधे पंजीरी खा रहे मौन हो गए ज्ञानी सभी देखा जब सब भेड़ चाल चल रहे आँखों में बाँध ली पट्टी कानो में ठेठी डाली है अपनी करतूतें छुपाने के लिए भेड़िये ने शेर की खाल पहनी है